![]() |
| this article source are eklavya.in |
प्रयोग बिना कैसा विज्ञान? लेकिन विज्ञान में प्रयोगों की भूमिका आखिर क्या है - इस पर आधारित है चार भागों का यह आलेख। पहले भाग में विज्ञान के मकसद, अवलोकन व अन्य प्रयोगों की भूमिकाएँ व वैकल्पिक सिद्धान्तों के बीच फैसला कैसे किया जा सकता है -- ये सब विभिन्न उदाहरणों के साथ। करके देखने के लिए पाठकों केलिए गतिविधियाँ भी हैं।
ज्ञान के बारे में सोचते ही प्रयोग और प्रयोगशाला की बात मन में आती है। वैज्ञानिक लोग आम तौर पर प्रयोग करते दिखाए जाते हैं। विज्ञान के इतिहास में भी प्रयोगों की खूब बातें होती हैं। कई लोग तो प्रयोगों को विज्ञान की विधि का अभिन्न अंग मानते हैं। ऐसा लगता है कि विज्ञान और प्रयोगों का चोली-दामन का साथ है। सवाल है कि यह बात कितनी सही है और यदि सही है तो विज्ञान में प्रयोगों का क्या स्थान है और क्या भूमिका है?
* क्या आपने कोई प्रयोग किया है (शिक्षण के दौरान या उससे अलग)?
* अपने द्वारा किए गए किसी एक प्रयोग के बारे में लिखिए कि आपने यह प्रयोग क्यों किया था। क्या आपके मन में कोई अपेक्षा थी?
* इसे कैसे किया था? क्या परिणाम आपकी अपेक्षा के अनुरूप मिले थे?
* आपके प्रयोग से क्या निष्कर्ष निकला था? विस्तार में लिखिए।
विज्ञान हमें क्या बताता है?
आगे बढ़ने से पहले यह देखते हैं कि विज्ञान का मकसद क्या है। यहाँ हम सिर्फ प्राकृतिक विज्ञान की बात कर रहे हैं, हालाँकि इनमें से कई बातें सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में लागू हो सकती हैं।
प्राकृतिक विज्ञान के मकसद पिछली सदियों में बदलते रहे हैं। आज हम मानते हैं कि विज्ञान का मकसद है कि अपने आसपास की दुनिया का एक विवरण देना और उसके अलग-अलग अवयवों के बीच सम्बन्ध स्थापित करना। इसके ज़रिए हम इस विश्व की एक तस्वीर निर्मित करते हैं और उसके कामकाज को समझने की कोशिश करते हैं। हमारी कोशिश होती है कि इस विश्व के नियमों का एक खाका तैयार कर पाएँ और यह देख पाएँ कि इसका संचालन किन नियमों के अन्तर्गत होता है।
इन नियमों की मदद से हम यह भी बता सकते हैं कि ऐसी ही परिस्थितियों में अन्य अवलोकन क्या होने की उम्मीद है।
विज्ञान का दूसरा मकसद यह समझाना भी है कि जो भी नियम हम खोजते हैं वे वैसे ही क्यों हैं। यदि दो अवयवों के बीच सम्बन्ध है, तो हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि क्या यह सम्बन्ध संयोगवश ही है या इन दो अवयवों में ऐसी कोई बात है कि इनके बीच सम्बन्ध अनिवार्य है। फिर यह भी देखने की कोशिश करते हैं कि क्या दो अवयवों के बीच सम्बन्ध ऐसा है कि एक के कारण दूसरा घटित होता है या क्या ये दोनों किसी तीसरे अवयव के क्रिया परिणाम हैं।
जब हम प्रकृति के विभिन्न अवयवों, क्रियाओं और घटनाओं के बीच सम्बन्धों का ताना-बाना बनाते हैं तो हम कहते हैं कि हम विश्व का एक मॉडल विकसित कर रहे हैं। यह मॉडल वास्तविकता के जितना निकट हो उतना ही अच्छा माना जाता है। ज़ाहिर है विज्ञान लगातार परिवर्तनशील उद्यम है।
इसमें एक साथ कई सिद्धान्त उभर सकते हैं जो विश्व की व्याख्या करने का दावा करते हैं। इनके बीच फैसला करना विज्ञान का एक प्रमुख काम होता है।
जब कोई व्याख्या या एक से अधिक व्याख्याएँ प्रस्तुत की जाती हैं तो उनके आधार पर भविष्यवाणियाँ करना भी विज्ञान का एक मकसद होता है। ज़ाहिर है अलग-अलग व्याख्याओं के द्वारा अलग-अलग भविष्यवाणियाँ होती हैं। इन भविष्यवाणियों की जाँच करके इनमें से अपेक्षाकृत सही व्याख्या को चुनना विज्ञान में आगे बढ़ने का मुख्य रास्ता है।
प्रयोग की भूमिकाएँ
विज्ञान में प्रयोगों की कई भूमिकाएँ हैं। सबसे पहले तो कुछ अवलोकनों को बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें प्रयोग का सहारा लेना पड़ता है। कई बार किसी परिघटना को समझने के लिए उससे सम्बन्धित प्रयोग करते हैं। ऐसा भी होता है कि कुछ घटनाएँ साथ-साथ होती हैं और उनके परस्पर सम्बन्ध के बारे में जानने के लिए प्रयोग करना होते हैं। प्रकृति को समझने की कोशिश में जब कोई नया सिद्धान्त सामने आता है तो हमें यह देखना होता है कि यह सिद्धान्त प्रकृति के बारे में क्या कह रहा है। सिद्धान्तों द्वारा किए गए दावों की जाँंच के लिए भी प्रयोग किए जाते हैं। प्रयोगों में हमें बेहतर-से-बेहतर अवलोकन प्राप्त करने के लिए उपकरणों की ज़रूरत पड़ती है। इन उपकरणों के विकास के लिए भी प्रयोग किए जाते हैं। हर प्रयोग करते समय हम एकदम शु डिग्री से तो शु डिग्री नहीं कर सकते। हम जिन चीज़ों के बारे में प्रयोग कर रहे हैं, हमें उनके बारे में पहले से बहुत कुछ पता होता है। पदार्थों, वस्तुओं वगैरह के बारे में ऐसी जानकारी प्राप्त करने के लिए भी प्रयोग किए जाते हैं।
अर्थात् स्पष्ट है कि प्रकृति की खोजबीन करने और प्रकृति का एक अमूर्त ढाँचा खड़ा करने के काम में अवलोकनों और प्रयोगों की भूमिका है। दरअसल, प्रयोग और कुछ नहीं, विशेष मकसद से अवलोकन करने की एक व्यवस्था ही तो है।
विज्ञान में प्रायोगिक विधि की स्थापना करने वाले फ्रांसिस बेकन के शब्दों में, “हमारे पास कुछ सीधे-सादे अनुभव (अवलोकन) होते हैं; यदि उन्हें वैसे ही स्वीकार किया जाए जैसे वे हैं, तो इसे संयोग कहते हैं, और यदि उनकी मांग की जाए तो वे प्रयोग होते हैं।” (फ्रांसिस बेकन, नोवम ऑर्गेनम, 1620)
यों भी कह सकते हैं कि प्रयोग एक सोची-समझी संरचना है जिसे इस तरह बनाया जाता है कि हम प्रकृति की किसी परिघटना को अलग-थलग करके, नियंत्रित ढंग से, अपनी मर्ज़ी से तोड़-मरोड़कर, परिस्थितियों में हेर-फेर करके उसका अवलोकन कर सकें। तब हम उस परिघटना का अवलोकन विभिन्न उपकरणों के माध्यम से कर पाते हैं और नाप-तौल भी कर सकते हैं। प्रकृति में होने वाली परिघटनाएँ काफी पेचीदा होती हैं और प्रत्येक परिघटना में तमाम किस्म के बल और क्रियाएँ काम करती हैं। प्रयोग करने के पीछे मकसद यह होता है कि हम इन्हें अलग-अलग करके देख पाएँ और अपनी मर्ज़ी से नियंत्रित कर पाएँ।
इस सन्दर्भ में कई लोग मानते हैं कि प्रयोग भी एक किस्म का अवलोकन ही है। उनका मत है कि प्रयोग एक खास किस्म से किए गए अवलोकन ही हैं। प्रयोगों का मकसद मात्र इतना है कि हम प्रकृति के बारे में जो कुछ जानना चाहते हैं, उसे एक विशेष तरीके से जानने की कोशिश करें। प्रयोग में हम उसी परिघटना को कुछ विशेष परिस्थितियों में करके देखते हैं ताकि अवलोकन ज़्यादा स्पष्टता से लिए जा सकें और एक-एक स्थिति के असर को परखा जा सके। प्रयोग से हमें कई बार वे चीज़ें देखने में भी मदद मिलती है जो वैसे हमारी पहुँच से बाहर हैं। जैसे आकाश के अवलोकन के लिए दूरबीन का उपयोग करने से हमारे सामने सौर मण्डल और उससे भी आगे के कई तथ्य उजागर हुए जो वैसे ओझल थे। इसी प्रकार से सूक्ष्मदर्शी तकनीक के विकास ने हमें यथार्थ के उन रूपों से परिचित कराया जो वैसे कभी नज़र न आते। तो पहले यह देखते हैं कि अवलोकन हमें कहाँ तक ले जा सकते हैं और प्रयोगों का पदार्पण किस चरण में होता है।

